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श्री आदिनाथ भगवान के भंडार की पेढी

श्री ओसवाल श्री संघ घाणेराव

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गोड़वाड़़ के प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन से ३५ किमी दूर सादड़ी देसुरी मुख्य सड़क पर २५ डिग्री अक्षांश और ७३ डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थित अरावली के आँचल में कुम्भलगढ़ की चोटी से १० किमी दूर, सुरम्य वनस्थली में बसा हे 'घाणेराव' | घाणेराव का नाम पंद्रहवी शताब्दी से विभिन्न ऐतिहासिक पृष्ठों से प्राप्त होता हैं, जिसमे यह घाणेराव, घाणेर, घाणो, घोणेरू, घाणेरा आदि नाम से संबोधित होता रहा हैं | चरली नदी, जो मेदपाट के बनास नदी की सासूक के नाम से विख्यात हे, के बायी और यह कस्बा 'गोड़वाड़ प्रांत' की राजधानी के रूप मे प्रसिद्ध हैं | भारत भर मे लोकोक्ति प्रसिद्द हे की 'ओ तो घाणेराव रो रावलो है कोई' | राजस्थान मे यह दोहा प्रख्यात है 

“गोडवाड़ मे घाणेराव, आडवाला मे बाली, काँटा मे कंटालिया, मारवाड मे पाली”

१५ वीं शताब्दी में प्राचीन घाणेराव मुछाला महावीर के आसपास बसा हुआ था | महाराणा कुंभा ने मूंछों पर उठे सवाल पर कहा की एक जगह पर दो मूंछों वाले नही रह सकते और उन्होने 'घाणेराव ' को वर्तमान स्थल पर आबाद किया | यहाँ के शिलालेख १० वीं शताब्दी से अध्यतन अपना पृष्ठ स्वर्णाक्षरों में पलट रहा है | सन १०१९ मे चौहान वंशीय राव लाखन, चालुक्य, राठोड़ वंशीय शाखाओं का इस क्षेत्र मे शासक के रूप मे अपना अस्तित्व है | घाणेराव का शासन १६८० ई. से चाणोद से मसूदा ( अजमेर ) तक महाराणा अमर सिंह द्वारा प्रदत्त रहा | इस गाँव का विकास महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह के काल मे हुआ था | प्राप्त १५० शिलालेखों की उपलब्धि इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि इसकी राज्य व्यवस्था निर्माण मे स्थापत्य कला का कितना योगदान रहा है | यहा का परकोटा, पॅंच दरवाजे, अंत दरवाजे, बावड़ियों की अदभुत निर्माण कला, शिल्प, नाड़ियों, नाले, तालाब, छतरियां, मंदिर, महल, कोठियां, झालिवाव, ४२ वैष्णव मंदिर, १२ जैन मंदिर, ७ मस्जिदें और दरगाहों के रूप मे इस वैभव को विस्तारित करता है |

यह वही घाणेराव हैं, जहाँ १०० वर्ष पूर्व चिंतामणी पार्श्वनाथजी का नया मंदिर निर्मित हुआ, तो उसकी प्रतिष्ठा समारोह में नव की तेरह वलें ( स्वामीवात्सल्य ) हो गई तब से यह मुहावरा प्रसिध्द हो गया की ' नव की तेरह घाणेराव ' मे हुई | वरकाणा महासभा के ९९ गांवों की होने वाली मीटिंग जाजम की शुरूवात करने मे घाणेराव के श्री जसराजजी सिंघवी का बड़ा योगदान था | यहाँ के ऐतिहासिक, दर्शनीय, अलौकिक, पौराणिक संगमरमर में कलाकृतियों से युक्त चम्तकारी ११ जिन मंदिर यहाँ की वैभवता प्रकट करते हैं |


पोरवालों के एक मंदिर को छोड़ सारे मंदिरो की व्यवस्था प्राचीन श्री आदिनाथ भगवान के भंडार की पेढ़ी ( घाणेराव ) संभालती है | घाणेराव मे ओसवालों के लगभग ९०० घर व पोरवालों के १५० घर है | राणकपुर तीर्थ के निर्माता धरणाशाह के वंशज में उनकी चौदहवीं-पंद्रहवीं पीढ़ी आज भी घाणेराव मे निवास करती है | 'छोड़ा तीर्थ' की व्यवस्था भी श्री आदिनाथ भगवान के भंडार की पेढ़ी ( घाणेराव ) देखती है |