श्री आदिनाथ भगवान के भंडार की पेढी

श्री ओसवाल श्री संघ घाणेराव

Muchala Mahaveer Tirth

श्री मुछाला महावीर तीर्थ : गोडवाड़ पंचतीर्थी का एक मुख्य तीर्थ 'श्री मुछाला महावीर तीर्थ' पाली जिले में घाणेराव से ६ कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में अरावली पर्वतमाला की गोद में घने जंगलो की बीच बहने वाली शुष्क नदी के किनारे जंगल में मंगल समान दो पहाड़ियो के बीच घिरे मैदान में स्थित हैं । यहां चौबीस देहरियों युक्त विशाल कलात्मक शिखरबंध भव्य-दिव्य जिनलाय में २५०० वर्ष प्राचीन श्री महावीर स्वामी भगवान की श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ, लगभग साढ़े चार फुट की अलौकिक परीकरयुक्त प्रतिमा विराजमान है ।
 
देव विमान समान जिनलाय के मंडप, स्तंभों व भमति में उत्कीर्ण कला के नमूने दर्शनीय हैं । गगनचुम्बी शिखर, बड़ा रंगमंच तथा फेरी के ज़रोखों की विविध कलापूर्ण जालियां, यहां की स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है । नृत्य करती देवी-देवताओं की मूर्तियां बड़ी मोहक लगती हैं । अगल-बगल की २२ देहरियां वि. स. ६०० से पहले की बांधी हुई हैं । वर्तमान गंभरा के लगभग १५०० वर्ष प्राचीन होने का अनुमान है । मूर्ति के नीचे स. १९०३ का एक लेख है, जिसके अनुसार इसकी प्राण प्रतिष्ठा स. १९०३ माघ वदि ५, शुक्रवार के दिन तपा्गच्छीय श्री शांतीसागरसूरीजी ने अहमदाबाद में की है । परीकर प्राचीन है, जिसमें श्री संघ घाणेराव द्वारा मूर्ति भरवाने का उल्लेख है । इसके अलावा एक और देवकुलीका में मुनीसुव्रत स्वामी प्रतिमा पर स. १८९३ में प्रतिष्ठित होने का उल्लेख है । अन्य एक देहरी के पाटडा उपर वि. स. १२१३ के भाद्रवा सुदी ४ मंगलवार का लेख है । जिसमें 'जेजलदेव' ऐसा लेख पढ़ने में आता हैं । मुख्य मंदिर के दरवाजे से लगे खंभों पर अलग-अलग शिलालेख खुदे हैं । पहले महावीरजी पेढी घाणेराव इसकी व्यवस्था संभालते थे, अब शेठ आनांदजी कल्याणजी पेढी संभालती है । मंदिर का जीर्णोद्धार वर्तमान समय में चालू हैं । २२ देहरिया सामूल पूननिर्माणाधीन हैं । बड़ी संख्या मे बंदारो का विचरण हैं ।
 
यहा करीब ६० से अधिक विभिन्न समय की राजाज्ञाओं के शिलालेख पर आंक भी अंकित हैं । 
 
मुख्य प्रतिमा खंडित होने से इस पर लेप किया हुआ है । इस खंडित प्रतिमा की जगह, दूसरी प्रतिमा स्थापन हेतु लाई गयी, मगर मूल मूर्ति गादि उपर से नही उठाई जा सकी, इसीलिए नई मूर्ति पास की देहरी मे बिठाई गयी । मुलनायक प्रतिमा के नीचे 'स. १०१० फाल्गुन सुदी ५ दिनेषडेग्च्छे' इतना पढ़ने में आता है । इससे यह ११ वीं सदी का प्राचीन मंदिर लगता है । भगवान महावीर के बड़े भाई नंदीवर्धन राजा द्वारा मूर्ति भरवाने का भी उल्लेख मिलता है । कहते हैं की महान अशोक के प्रपौत्र के पौत्र सोहनसिंह ने इसे बनवाया था । कहीं-कहीं प्राचीन लिपि मे लिखे प्राप्त शिलालेखों में प्रभु के बड़े भाई नंदीवर्धन के परिवार से संबंधित सोहनसिंह द्वारा बनवाने का उल्लेख भी मिलता है । पहेले यहां कुल ५४ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित थी । 
 
मंदिर उत्तरर्मुखी है । द्वार के दोनो ओर विशाल हाथी खड़े हैं । दायीं ओर के हाथी के पीछे चम्तकारि व हज़राहुजूर अधिष्ठायकदेव की प्रतिमा प्रतिष्ठित है व अखंड ज्योत प्रज्वलित है । जैन-अजैन सभी यहा मन्नत मानते हैं । मंदिर के सामने मुख्य गेट है, जो कभी सोनगढ़ के नाम से जाना जाता था । शृंगार चौकी के दाई ओर स. १९०७ मगसर वदी १ का लेख है । मंदिर में दो मंडप हैं जिसमे दूसरा मंडप स्तंभों पर खुला है ।
 
 मंदिर की दो तरीके से प्रदक्षिणा हो सकती है एक अंदर से दूसरी बाहर से । भमति में वि. स. १७१७ माघ सुदी १३ के प्रतिष्ठित आ. श्री विजयदेवसूरीजी के पगलीए हैं । भमति की प्रभुजी की २२ देहरियो तथा ध्वजा-दंड-कलश वि. स. २०२२ वैशाख सुदी ८ को जीर्णोद्धारित प्रतिष्ठा हुई है । हर वर्ष वैशाख सुद ८ को ध्वजारोहण का मेला व चैत्र सुदी १३ का मेला भरता है । घाणेराव से श्री संघ द्वारा शोभा यात्रा रवाना होकर श्री मुछाला महावीरजी पहुँचती है । भमति के एक प्रतिमाजी उपर सवंत१२४५ का लेख,  दूसरी प्रतिमा पर सवंत १७८६ का लेख , भमति में दूसरे प्राचीन पगलाजी पर सवंत १७९४ माघ सुदी १३ का लेख, श्री गौतम स्वामी छत्री पर सवंत १९९२ का लेख आदि यहां की प्राचीनता प्रकट करते हैं । श्री हिरविजयसूरीजी के परिवार के अनुयोगाचर्य श्री हीत विजयजी मूर्ति सवंत २०२४ की प्रतिष्ठित है ।
 
श्री मुछाला महावीर : एक दंतकथा 
कहते हैं की मंदिर की प्रतिष्ठा के बाद किसी समय मेवाड़ के राजा कुंभा ( कहीं-कहीं महाराणा राजसिंहजी ) अपने सामंतों के साथ यहाँ दर्शनार्थ पधारे । मंदिर के पुजारी ने महाराणा को भगवान का पक्षाल जल ( न्ह्वण जल ) देकर आदर किया, पर जल में एक बाल देख एक हजूरिये ने व्यंग में कहा की क्या आपके भगवान मूँछो वाले हैं? पुजारी अक्षयचक्र ने विश्वास के साथ कहा की दाढ़ी-मूंछ क्या, हमारे भगवान तो अनेक रूप धारण करने में समर्थ हैं । इस पर महाराणा कुंभा ने पुजारी को यह सब तीन दिन में सिद्ध करने को कहा, अन्यथा सज़ा ।
 
 पुजारी ने अठ्ठम तप स्वीकारा व प्रभु के सक्षम आसान लगा दिया । पुजारी की असीम दृढ़ता से तीसरे दिन रात्रि में अधिष्टायक्देव ने प्रत्यक्ष होकर आशीर्वाद दिया । सुबह पुजारी महाराणा को प्रभु मंदिर ले गया । मुख्य द्वार खुलते ही सभी को दाढ़ी-मूंछ सहित प्रभु प्रतिमा के दर्शन हुए । सभी आश्चर्यचकित हुए ओर अभिवृदित भाव से सभी नतमस्तक हुए । मगर हास्य व्यक्त करने वाले उसी हजूरिये ने शंका व्यक्त की ओर वास्तविकता का पता लगाने हेतु प्रभु प्रतिमा के मूंछ का एक बाल खींचा, जिसमें से दूध की धारा प्रवाहित होने लगी ओर हजुरिया अशातना से गिरकर तड़पने लगा, सभी साश्चर्य काँपने लगे । पुजारी से यह आशातना सहन न हुई और उसने हजुरिये को श्राप दिया की 'जा तेरे वंश मे सात पीढ़ी तक दाढ़ी-मूंछो रहित पुरुष होंगे । उदयपुर के रहने वाले उस हजुरिये के परिवार में कई पीढ़ियो तक दाढ़ी-मूंछो रहित पुरुष पैदा हुए । आज तक यह परिवार 'नमूछिया' नाम से प्रसिध्द हैं, इसी चमत्कार से की वजह से प्रभु श्री मुछाला महावीरजी के नाम से प्रसिद्ध हुए । 
 
इसी तरह एक और दन्तकथा प्रचलित हैं की प्राचीन काल में घाणेराव इसी मंदिर के आसपास बसा हुआ था, जिसके अवशेष आज भी दिखते हैं । फिर घाणेराव आज के वर्तमान स्थान पर बसा । इस फेरबदल के बारे में कहते हैं की एक बार मंदिर का पुजारी राजदरबार की तरफ से मिलने वाले दिवेल को लेने दरबार में गया मगर देरी होने लगा तो पुजारी ने जल्दी देने को कहा इस पर महाराणा ने कहा की तेरे भगवान क्या मूंछो वाले हैं जो इतनी जल्दी करें । इस पर पुजारी ने कहा की हाँ मेरे भगवान की मूंछे हैं । और फिर उपरोक्त कथा की तरह आगे की घटना घटी । 
 
दाढ़ी-मूंछो के दर्शन के बाद राणाजी ने निश्चय किया की एक जगह दो मूछो वाले नही रह सकते । इसी बात पर राणाजी ने दूर नदी के किनारे किला बंधाकर नया घाणेराव बसाया । तब से मेले के दिन राणा परिवार द्वारा आकर पहले पूजा करने का रिवाज चला । इस घटना से तीर्थ की प्राचीनता दृष्टिगोचर होती हैं । कहते हैं की आज भी प्रभु महावीर की मूल प्रतिमा का मुखमंडल दिन मे अलग, शाम मे अलग और प्रात: बिल्कुल अलग प्रकार से बन जाता हैं । 
 
इस नाम पर एक और अन्तर्कथा मिलती हैं -  
 
१. मेवाड़ के महाराणा एव पुजारी की परीक्षा से जब दाढ़ी का बाल उखाड़ा गया तो दूध चलक आया । प्रार्थना करने पर भगवान ने राणा को अभय वर दिया की तुम मेवाड़ के दीवान से जाने जाओगे ।
 
२. मुछाला मानदेव ने इस स्थान पर जो कभी कालभैरव व शिवालय था, भूमि पर सहयोग देकर जीर्णोद्धार की भी किंवदंती प्रचलित हैं । जो मोहम्मद खिलजी के समय में, मालदेव चितौड का शासक था और ये प्रदेश भी उनके अधीन था ।
 
मार्गदर्शन : यह तीर्थ फालना रेलवे स्टेशन से ४५ कि.मी., रानी रेलवे स्टेशन से ५० कि.मी., जोधपुर हवाई अड्डे से करीब १९० की. मी., घाणेराव बस स्टॅंड से ६ की. मी., उदयपुर से १२० की. मी., और राणकपुर से २७ की. मी., दूर स्थित है । सरकारी बसे घाणेराव तक आती हे. घाणेराव से प्राइवेट बस टॅक्सी मिलती है । फालना-सादडी से सभी साधन उपलब्ध हैं ।
 
सुविधाए: तीन सादे और आठ अटॅच कमरों की पुरानी धर्मशाला बनी हुई है । दो हॉल हैं, जिसमें एक में साधु-साध्वी और दूसरा यात्रियों हेतु काम आता है । संघ रसोई घर अलग से हैं । 
 
पेढी : श्री आनांदजी कल्याणजी पेढ़ी 
श्री मुछाला महावीर जैन तीर्थ 
मुछाला महावीर रोड,
मु. पो. घाणेराव, तहसील देसूरी
जिला पाली, ( राज. ) पिन ३०६७०४
संपर्क : ०२९३४ २८४०५६